शनिवार, 16 अप्रैल 2011

अजब पागल सी लड़की है

अजब पागल सी लड़की है, मुझे हर ख़त में लिखती है, मुझे तुम याद करते हो, तुम्हे मै याद आती हु, मेरी बाते सताती है, मेरी नीन्दे जगाती है , मेरी आँखे रुलाती है, दिसम्बर की सुनहरी धुप में अब भी टहलते हो, किसी खामोश रास्ते से कोई आवाज़ आती है, ठीथर ती सर्द रातो में अब भी छत पर जाते हो, फलक के सभी सितारों को मेरी बाते सुनाते हो, किताबो से अब तुम्हारे इश्क में कोई कमी आई या मेरी याद की शिद्दत से आँखों में नमी आई , अजब पागल सी लड़की है मुझे हर ख़त में लिखती है ,जवाबन उसे लिखता हु, मेरी मसरूफियत तो देखो सुबह से शाम चरागे उम्र जलता है फिर दुनिया की कई मजबूरिय पाँव में बेडिया दाल रखती है ,मुझे बेफिक्र चाहत भरे सपने नहीं दीखते, सितारों से मिले अरसा हुआ नाराज़ हो शायद ,किताबो से शरफ अभी मेरा वैसा ही कायम है,फर्क पड़ा है इतना के उन्हें मै अरसे में पड़ता हु.....तुमसे किसने कह दिया सदफ के मै तुम्हे याद करता हु...तुमसे किसने कह दिया सदफ के मै तुम्हे याद करता हु......


बड़ी याद आती है किसी की "

"बड़ी याद आती है किसी की , वक़्त ऐसा बी आया जब मैंने उसे चुपके से देखा और वो शरमाई थी ,कभी वक़्त ऐसा भी आया जब मै उसके अलग तरह के नाम रखता और वो मुस्कुराती ,रास्तो पे चलते हुए दिल में उसकी तस्वीर रख ल...ेता और सोचता के हम साथ में तो है , कभी वक़्त ऐसा भी आया जब मै दिन भर भूका रहता और वो भी मेरे लिए भूकी रहती ,मै जानता था के हमारे बिच कोई तो दीवार है जो जुदा कर जाती है हमेशा ,वो हसकर कहती के हमारे साथ तो खुदा है शायद इसलिए हम जुदा है ,कभी वक़्त ऐसा भी आया है जब मै चाँद से उसकी तारीफ़ करता था और वो कहती थी के मै झूट कहता हु ,वक़्त ऐसा भी आया जब उसने मेरा ख्याल रखना ही छोड़ दिया और मेरी चाहत और ज्यादा बड गई ,कभी हम एक दुसरे को युही खामोशी से देखते और रात गुज़र जाती थी ,मै जब भी उसके ख्वाब देखता तो वो ख्वाबो में ही कहती के मै तुमसे बोहोत दूर हु 'Anik',वक़्त ऐसा भी आया जब उसने अपनी जुल्फों का दीदार करवाया और मै मदहोशी से झूम उठा ,कभी कभी ऐसा भी हुआ है जब मै दिन भर उसकी याद करता था और वो भी उसी श्हिदत से मुझे याद करती थी ।मै तारो की झुरमट में उसका इंतज़ार करता था और वो अपनी खिड़की में आकर मुझे पुकारती ,उसका वो पुकारना मै सुन नहीं पाता था पर फिर भी बड़ा अच्छा लगता था ,वक़्त ऐसा भी आया है कभी जब मै उन जगाहो पर जाता जहा जहा वो मुझसे मिली थी ,जब मै उसे बताता तो वो अन्दर से खुश होती और बहार से नाराज़ ,कभी ऐसा भी हुआ है जब मुझे चोट लगी और दर्द उसे हुआ पर मै समझ ही नहीं पाया के ऐसा क्यों होता है ,मेरे लाख पूछने पर बी वो सिर्फ मुस्कुराती थी ,वक़्त ऐसा भी आया जब वो मुझसे मिलने आई और मै नदारद था ,डरता था उससे नज़रे मिलाने में ,जाने क्या अजब सी कशिश थी उसकी नजरो में जो मै बस उसे देखता ही गया देखता ही गया ,अब बात कुछ और है ,जो सितारे देखने को तरसते थी आज आंसू बनकर बरसते है ,सबकुछ फ़ना होगया है ,चाँद जाकर बादलो में हमेशा के लिए छुप गया ,अब कभी सोचता हु तो एहसास होता है उस हसीं चीज़ का जिसे हम 'मोहब्बत ' कहते है ...वही 'मोहब्बत' जो रुलाती है ,सताती है ,उसकी याद दिलाती है ...वो तो चली गई पर मोहब्बत के कुछ अश्क छोड़ गई ॥जिन्हें अब मै रोज़ पिता हु ॥अब मै ऐसे ही जीता हु ॥दूर से सिर्फ एक फ़रियाद आती है किसी की ॥बड़ी याद आती है किसी की ...बड़ी याद आती है किसी की " By- ANIKET DAMBARE Allah malik hai
"बड़ी याद आती है किसी की , वक़्त ऐसा बी आया जब मैंने उसे चुपके से देखा और वो शरमाई थी ,कभी वक़्त ऐसा भी आया जब मै उसके अलग तरह के नाम रखता और वो मुस्कुराती ,रास्तो पे चलते हुए दिल में उसकी तस्वीर रख लेता और सोचता के हम साथ में तो है , कभी वक़्त ऐसा भी आया जब मै दिन भर भूका रहता और वो भी मेरे लिए भूकी रहती ,मै जानता था के हमारे बिच कोई तो दीवार है जो जुदा कर जाती है हमेशा ,वो हसकर कहती के हमारे साथ तो खुदा है शायद इसलिए हम जुदा है ,कभी वक़्त ऐसा भी आया है जब मै चाँद से उसकी तारीफ़ करता था और वो कहती थी के मै झूट कहता हु ,वक़्त ऐसा भी आया जब उसने मेरा ख्याल रखना ही छोड़ दिया और मेरी चाहत और ज्यादा बड गई ,कभी हम एक दुसरे को युही खामोशी से देखते और रात गुज़र जाती थी ,मै जब भी उसके ख्वाब देखता तो वो ख्वाबो में ही कहती के मै तुमसे बोहोत दूर हु 'Anik',वक़्त ऐसा भी आया जब उसने अपनी जुल्फों का दीदार करवाया और मै मदहोशी से झूम उठा ,कभी कभी ऐसा भी हुआ है जब मै दिन भर उसकी याद करता था और वो भी उसी श्हिदत से मुझे याद करती थी ।मै तारो की झुरमट में उसका इंतज़ार करता था और वो अपनी खिड़की में आकर मुझे पुकारती ,उसका वो पुकारना मै सुन नहीं पाता था पर फिर भी बड़ा अच्छा लगता था ,वक़्त ऐसा भी आया है कभी जब मै उन जगाहो पर जाता जहा जहा वो मुझसे मिली थी ,जब मै उसे बताता तो वो अन्दर से खुश होती और बहार से नाराज़ ,कभी ऐसा भी हुआ है जब मुझे चोट लगी और दर्द उसे हुआ पर मै समझ ही नहीं पाया के ऐसा क्यों होता है ,मेरे लाख पूछने पर बी वो सिर्फ मुस्कुराती थी ,वक़्त ऐसा भी आया जब वो मुझसे मिलने आई और मै नदारद था ,डरता था उससे नज़रे मिलाने में ,जाने क्या अजब सी कशिश थी उसकी नजरो में जो मै बस उसे देखता ही गया देखता ही गया ,अब बात कुछ और है ,जो सितारे देखने को तरसते थी आज आंसू बनकर बरसते है ,सबकुछ फ़ना होगया है ,चाँद जाकर बादलो में हमेशा के लिए छुप गया ,अब कभी सोचता हु तो एहसास होता है उस हसीं चीज़ का जिसे हम 'मोहब्बत ' कहते है ...वही 'मोहब्बत' जो रुलाती है ,सताती है ,उसकी याद दिलाती है ...वो तो चली गई पर मोहब्बत के कुछ अश्क छोड़ गई ॥जिन्हें अब मै रोज़ पिता हु ॥अब मै ऐसे ही जीता हु ॥दूर से सिर्फ एक फ़रियाद आती है किसी की ॥बड़ी याद आती है किसी की ...बड़ी याद आती है किसी की " Allah malik hai

सोमवार, 21 सितंबर 2009

१-“तू मुझे याद करे ये मेरी तहरीर नही,
मई तुझे भुला दू क तू कोई तस्वीर नही,
भुलाया जो अब क तुझे तो अश्को ने याद दिला दी,
बात निकली जब इकरार-ऐ-मोह्हबत तो हमने अपनी जुबा छुपा ली,
दफना दिया अपने अरमानो को क तू खुश रहे,
आज फ़िर हमने अपनी मोह्हबत अपने हाथो से जला ली”



२-“अधूरे एहसासों को तेरी मोह्हबत-ऐ-लौ में दबा रहा हु,
निगाहों में बसी है आप ये जानते हुए भी अश्क बहा रहा हु,
नज्दिकिया बड़ा करे क आदत लगा दी आपने,
जानकर तुझको अब दुरिया बड़ा रहा हु,
एक सवाल किया था चुप रहकर उसने,
जवाब-ऐ-दाग बेवफा-ऐ-दामन पेट एरे छोड़ कर जर आहा हु”



३-“सोये थे कब्र में तेरे ख्वाबो को लिए पलकों पे,
क फ़िर वो जगाने आगये,
अजब सा रहत-ऐ-सुकू मिलता है उन्हें ज़ख्म अदा कर,
क जन्नाज़े पे मेरे मुस्कुराने आगये,
अब तक रोक रखा थे,तेरा दामन दागदार न हो,
क मेरे अश्क आँखों से तेरी याद क बाहने आगये,
अभी अभी टुटा है ये दिल और वो है ,
क नजरो में लिए मोह्हबत फ़िर आजमाने आगये”


४-“तू हसीं न होती तो मेरा दिल न धड़कता,
तेरे होते सुर्ख न होते तो मुझे प्यास न होती,
तेरे एहसास न मचलते तो में ज़ज्बात संभल लेता,
तेरी रूह न मिलती तो में जिस्म जला देता,
तुझे तील न होता तो में ख़ुद जल जाता,
तेरी जुल्फ न उलझती तो में सुलझ जाता,
तू जो न सिमट टी तो में बिखर जाता,
तू न दूर जाती तो में और करीब आता,
तू जो अश्क न बहती तो में रो लेता,
तू जो तनहा न होती तो में इंतज़ार करता,
तू जो रास्ता न होती तो में मूड जाता,
तू जो हया न होती तो में शर्माता,
तू जो शमन अ होती तो में पिघल जाता,
तू जो वफ़ा न होती तो में बेवफा हो जाता,
ए मेरे हमराज़-ऐ-रकीब,तू जो नफरत न होती
तो में मोह्हबत हो जाता”

५-“हर ज़रर-ऐ में दीदार था कभी तेरे रुखसार का,
आज सुर्ख रुख से ज़रर-ऐ भी फ़ना हो गए,
कभी पड़ते थे तेरे नक्श-ऐ-कफे प् ज़मी पर,
आज दीदार-ऐ-वजूद में हम कज़ा हो गए”

६-“तन्हाई की बारिश ने जब भिगोया तेरे सुर्ख बदन को,
घून्ग्रू भी शर्मा गए पैरो की जुदाई में,
हमने तो मांगी थी एक साँस तेरी धडकनों से,
दाद्काने ही रोक दी आपने बस गिरो की जुदाई में”


७-“जिस्म टकराया तेरे वजूद-ऐ-आलम से,
क्यों मोह्हबत थी....
कब्र पे फूल छाडे थे तेरे सेहरे क,
क्यों मोह्हबत थी....
तुम इलाज़-ऐ-गम न दूंध हमारे ज़ख्मो क,
क्यों मोह्हबत थी....
पनाह में तेरे आगोश किसी और क थे,
क्यों मोह्हबत थी....
निकाह में तेरे मेरे जनाजे की थी,
क्यों मोह्हबत थी....
मुड़ते हुए उसने कहा क मोह्हबत हैं ...
हमने फ़िर कह दिया बस मोह्हबत थी......”


८-“पाख-ऐ-बदन से जब छु क निकली रूह तेरी,
न ज़मीन ने समेट न आसमा ने नजर झुकाई,
तुम तो वफ़ा से भी बे-वफाई कर गए,
और हमने तो बे-वफाई से भी वफ़ा की कसमे खाई....”


९-“ज़ुख्ती पलकों ने तेरी जब दी इज्ज़त मेरी लौ को,
ज़ज्बातों की जुबा बंद न कर पाया था..,
जब चरागों ने समेत लिया तेरे एहसासों को
आगोश में महसूस हुआ क,
जलते चरागों में तेरा साया था...”

१०-“जब मसरूफ होकर खुदा ने तेरी तक़दीर बाने होगी,
बिखर न जाए तेरे वजूद से टकरा कर वो तस्वीर बनाईं होगी,
लड़ता रहा वो खुदा भी ता-उम्र मुझसे,चीन न लू तुम्हे कही,
न इजाद करेंगे ऐसी हूर कभी,
खुदा ने भी आपको बनाकर कसम खाई होगी”

११-“ज़िन्दगी ने ज़ख्मो को कभी सहलाया ही नही,
अरमानो को एहसासों की पलकों ने छुपाया ही नही,
कहा थे तुम क भटक रहे थे तेरी आगोश-ऐ जुनू में,
और आप समझे क रूह में मेरे तेरा साया ही नही...”


१२-“तेरे दर्द में मेरे अश्क बहे जरुरी तो नही,
मेरे नाशाद पे तेरे फूल रहे जरुरी रो नही,
किसी और की तुर्बत पे हम सोये जरुरी तो नही,
तेरी यादो क अश्क पलकों पे सजा क रोये जरुरी तो नही,
तेरे बे-वफाई करे हम महरूम हो वफ़ा से जरुरी तो नही,
हम गुलिस्ता में मुस्कुराए तुम जियो खफा से जरुरी तो नही,
तुम कतला करो अरमानो का,हम में शराफत हो जरुरी तो नही,
तुम नफरत का सैलाब हो,हम ताबीर-ऐ-मोह्हबत हो जरुरी तो नही...”


१३-“तेरी सितार-ऐ-हुनर पे जब खुदा ने मोह्हबत-ऐ-लौ जलाई,
हमने खुदा से तेरी कज़ा की इल्टीजा रुकवाई,
अक़ुईब ने मेरे रिंद से कहा उ नाफ्रातो क सन्नाटे में,
कहा से ये चीरती भीड़ में ,खुदा ने करिश्मा-ऐ-हूर बनाई”


१४-“इन हवाओं में तेरे एहसासों की रौनक आज भी है,
मेरे मुकद्दर की लकीरों में हिज्र की लकीर आज भी है,
मुन्तजिर है तेरे दीदार को निगाहें क इंतज़ार आज भी है,
ढूँढता है तेरे अजीजों रुख को सादिक क वो फरार आज भी है,
मौत किसी और क लिए ठहरी है,हम मौत क तलबगार आज भी है,
वो हमारे कदमो में सर झुका इस्तकबाल करे,
हमे उनसे मोह्हबत-ऐ-इनकार आज भी है....”

१५-“अश्को में तब्दील होकर जो
तेरी तस्वीर नजरो से बह गई,
सिसकिया धडकनों में और
जान जुबा पैर रह गई,
हमने तो नीलामी में बोली लगा दी
ताबीर-ऐ-मोह्हबत की,और वो थे क,
ख़रीदा नही,बिकवा क अल्लाह-हाफिज़ कह गई...”

१६-“कब्र से हाथ निकले मेरे जन्नाज़े क लिए,
इंसानो की फितरत से जो महरूम है,
पाक-ऐ-साफ़ बदन को मिटटी खा गई,
और मिटटी में ढूँढ रहे थे हमे तेरा वजूद...”

१७-“फिजाओं में आज फिर वो नमी सी क्यों है,
ज़िन्दगी में सबकुछ है फिर कज़ा की कमी सी क्यों है,
सासे धडकनों से टकरा कर लबो पे उ थमी सी क्यों है,
आसमा ओअद लिया तेरे हुस्न को ढकने क लिए,
फिर पैरो तले खिसकी ज़मी सी क्यों है...”


१८-“आज फिर हवा तेरे जिस्म को छु क उ गुजर गई,
मेरी लाचारी तेरे अश्को क तले मर गई,
कहर बरपाती थी तेरी अदाय-ऐ किसी ज़माने में,
ए तब्बस्सुम आज वोही अदाय-ऐ मंजर-ऐ-मौत,
देख कर सिहर गई....”

१९-“सुना है कभी वो हमारी मौत की दुआ माँगा करते थे,
वो न जाने क हम उन्ही दुआ-ओ में उनको माँगा करते थे,
साथ चोर्र क मेरा चल दिए रक़ुइबो की बज्म में आज वो,
शराब में हम तब भी ए रिंद नशा माँगा करते थे,
मेरी तक़दीर तो लिखी गई खून-ऐ-खंज्जर से,मेरे जानिब क हाथो,
क्यों हम उनसे अपनी तक़दीर-ऐ-मोह्हबत माँगा करते थे...”

२०-“तेरी उदास निगाह-ऐ तकती है राह उन
गलियारों में जहा तेरे कदम गुजरा करते थे,
आज हम उन्ही गलियारों की मिटटी में घुमा करते है,
खुदा खैर करे उन हाथो की जिसने,
तराशा है ये पाक-ऐ-बदन,वो तराश न दे कोई
और हुस्न-ऐ-मल्लिका इसी डर से उसके कदम चूमा करते है....”

२१-“ए मेरे हम राज़-ऐ-माजी
अपनी नजरो से मेरे अश्क न बहा,
तेरी निगाहों से गिर गया जो मई इसबार
तो ख़ुद को ढून्दुन्गा कहा,
मेरी तुर्बत पे जो चदय तुने
शादी का जोड़ा,मेरी कज़ा रुक गई,
अबतक मेरी कज़ा को तेरी आखरी नज़र का इंतज़ार रहा...”

२२-“तेरी हुस्न की सतेह पे जो हूँ-ऐ-इल्जाम कवल हो जाती,
छलकते अश्को को मोअद देते हम तो शायद ग़ज़ल हो जाती,
माहताब कहना चाहता हु तुझे ए मल्लिका-ऐ-तस्सौर
इजाज़त हो तो इल्तेजा सफल हो जाती,
रुकते है आज भी कब्र पव ओ गुजरते हुए रिंद की तरह,
वफ़ा इंतज़ार में ढली और रुसवाई कल हो जाती...”

२३-“ कहता है वो ए खुदा तेरे हाथो में
करिश्मा है जो बनाई ऐसी हूर है,
दिल में इतनी दर्द-ऐ-लब्ज़ भर दिए,
क नासूर भी ज़ख्मो से चूर है,
हमे तो इल्म न था क वो बेवफा है,
उसकी निगाहों ने कुछ न कहा,
कही तो उसमे मेरी खता जरुर है...”

२४-“फुरकत में तेरी इल्जाम-ऐ-मोह्हबत को रुसवा होने न दिया,
रोना चाहता था तेरी यादो से लिपटकर,
पर तेरे बहते अश्को ने रोने न दिया,
तेरी निगाहों में बसना चाहता था मई,
तेरी पलकों ने मोतियो को खोने न दिया,
जनाजा खुली आँखों से तरसता रहा दीदार-ऐ-यार को,
और उसने कब्र में भी चैन से सोने न दिया...”

२५-“कब्र से निकलते हाथो ने जब तेरे जिस्म को छुआ हो,
लाशो की भी धड़कने रुक गई,जैसे कुछ हुआ हो,
कभी उन लाशो क बिच हम सोया करते थे तेरी यादो को लिए,
आज जल गई मेरी रूह तेरे मोह्हबत-ऐ-नाशाद पर,जैसे उठ रहा धुआ हो”

२६-“आगया वो मेरी शौक-ऐ-इज़हार का दुश्मन,
जो मुझ पर हस रहा है,
फितूर में रिंद है,मैखाने खाली पड़े है,
और जम साकी को कास रहा है,
नफरत भरी नज़रे खंज्जर का काम करेंगी,
जेहर नजरो का एहसासों को दस रहा है,
कई पर्दों में छुपा रखा दिल मेरा,
न जाने क्यों तेरे हुस्न-ऐ-दीदार में,
दिल बार बार फस रहा है....”


२७-“कहा है मेरे वो अपने जो मुझे जला क चल दिए,
कब्र पे लाश पड़ी है और तुर्बत पे ख़ाक मॉल दिए,
सदिया बीत गई उन सवालों का ज़िक्र किए,
तेरी खामोशी ने अब सवालों क हल दिए,
वक्त न रहा क अब कज़ा से लाडू तेरे लिए,
हमने तेरी मौत को ज़िन्दगी क कुछ पल दिए..”


२८-“लफ्जों ने मु मोअद लिया है मेरे ज़ज्बातों से,
कहा से लाऊ वो दर्द-ऐ-हया जो चुराया करता था रातो से,
भटक रहा हु तस्सौर में तेरी तक़दीर से लड़कर,
क डरता हु अब मुलाकातों से,
और बेवफाई से तेरी टुटा इसकदर क,
गला घोट दिया मोहब्बत का अपने ही हाथो से..”

२९-“वो सोते भी है तो उनमे नजाकत होती है,
हम खुली आँखों से भी जागे तो मोह्हबत होती है,
रुखसार से परदा हटा दो बेखबर नींद में,
बाज़ार होकर जो दीदार हो तेरा तो रहमत होती है,
खुदा भी मांगता है उनके ख्वाबो में आने की इजाज़त,
ख्वाब तोड़कर जो उठे आँखे मलते हुए तो क़यामत होती है..”

३०-“जन्नत की हूर कहू या हस्त हुआ ख्वाब कहू,
मुन्तजिर मोह्हबत में सवाल या नफरत में जवाब कहू,
तेरी आहतो को ज़मी का नसीब कहू,
या मैकदों को लुटने वाला रकीब कहू,
मोह्हबत को तेरी एक सज़ा कहू,
या ज़िन्दगी को जीती एक कज़ा कहू,
तू मिली मुझे खुदा की रहमत कहू,
मशक्कत की पाने की ये तेरी ज़हमत कहू,
सब कहकर भी तू मुझसे खफा है,
मुन्तजिर मोह्हबत में बाज़ार हु,
और तू आज भी बे-वफ़ा है.....”

३१-“मोह्हबत में अपने अरमानो को कुछ ऐसे कुचल रहा हु,
पाक-ऐ-ज़मी ख़त्म हो गई ,फ़िर भी मई चल रहा हु,
शब्-ऐ-गुलशन में सितारों की बज्म में ढल रहा हु,
सादिक तेरी निगाहों में अश्को की तरह खल रहा हु,
खुली आँखों में तेरे एक हसीं ख्वाब की तरह पल रहा हु,
तू जिए आबाद-ऐ-ज़िन्दगी मई कज़ा बन क ताल रहा हु,
ख़त्म हो गई कब्र में भी जगह,
फ़िर भी जनाजे से उठ कर चल रहा हु..”

३२-“तेरे शहर में आज भी अजनबी हु ,
जो शहर जलाना चाहता हु,
तू ज़िन्दगी से दूर है,
और मई कज़ा क करीब आना चाहता हु,
खोया है तुझे सब पाकर,
सब खोकर अब तुझे पाना चाहता हु,
हलक तक फासी रही रूह मेरी तेरे इंतज़ार में,
क वो बेवफा है ए खुदा ये बताना चाहता हु...”


३३-“हमने भी फरियाद की खुदाय-ऐ-आला से,
तेरे हुस्न का दीदार तो हो,
एक बार सोचा मांग क देखे तुझे उससे,
या सिनी पर तेरी बाहों का हार तो हो,
मुरझा गए खुशनुमा कवल भी तेरे रुख को देख,
मोअद देंगे आती कज़ा को बस उन्हें हमसे प्यार तो हो..”


३४-“तेरे जिस्म में मेरी रूह की तकदीर इस कदर
फूट रही है,
चर्काह है बे-वाफी का सर-ऐ-बाज़ार,और वो
मोह्हबत में हमसे रूठ रही है,
दामन में समेटे एहसास और टर्किश-ऐ-अजल
दामन से छूट रही है,
ए मेरे हमराज़ आ थाम ले मुझे,
आखरी सास अब इंतज़ार-ऐ-यार में टूट रही है..”




३५-“उसका खुह्मा बदन जब सर-ऐ-बाज़ार नीलाम हुआ,
जिस्म से जा टूट गई कुछ ऐसा एह्ह्तारा हुआ,
शराब ने तोड़ दी नैफिज़-ऐ बोतल,
क अश्को का भी नज़रे-ऐ-जाम हुआ,
मेरे ही हाथो बिक गई मोह्हबत मेरी,
ए खुदा ये कैसा नासूर-ऐ-काम हुआ..”

३६-“हल्का से ये आज फिजाओं में क्यों सुरूर है,
बंद है ताबूत में एहसासों की तरह,
फ़िर भी क्यों मशहूर है,
शुक्र है तू ताजमहल से खुबसूरत है,
कही तो हमे इसका गुरूर है,
जनाजे क साथ भी मेरे निकाह की तामीर की उसने
कही न कही मोह्हबत जरूर है...”


३७-“फरियाद-ऐ-कज़ा की हमने सर-ऐ-बज्म
पर सुनने वाला कोई नही
ख्वाब नजरो से टूट कर चौराहे पर बिक गए,
अब ख्वाब बुनने वाला कोई नही,
मोह्हबत-ऐ-खंज्जर से काट दिया उसने ज़ज्बातों को मेरे,
टुकड़े पड़े है गलियो में,पर अब चुनने वाला कोई नही..”


३८-“आज चाह टूट जाए इसकदर,
क चाहकर भी टूट न पाये,
तन्हाई क साथ बैठे थे क,
जाम हाथ से छूट न पाये,
मनाते रहे ता-उम्र उनको सर झुकाए,
क हम कभी उनसे रूठ न पाये,
हम तो बैठे थे सर-ऐ-बाज़ार मोह्हबत की दूकान लगाये,
पर बेवफा वो हमे अब तक लूट न पाये..”


३९-“देख क तेरे डर से खाली जर रहा है कोई,
रिंद शराब में डूबा ,और आग लगा रहा है कोई,
फ़िक्र जुल्फों में खो गई,जुल्फों को सुलझा रहा है कोई,
मैकदे में नजरो से पिलाया,और जम बना रहा है कोई,
बे-वाफी की मूरत है,ख़ुद को वफ़ा बता रहा है कोई,
दफना दो मुझे कई गज ज़मी क निचे,
हाथ फैलाए खुली कब्र से बुला रहा है कोई...”


४०-“जिंदा हु इसकदर क हर लम्हा ज़िन्दगी हस्ती है,
लोग कहते है क ये तो मौत की शेह परस्ती है,
निगाहों में उनकी तस्वीर छुपी है,अदाओं में अजब मस्ती है,
हमने गुज़ारा वक्त खान्दारो में,लोग कहते है ये मेरी बस्ती है,
तौल रहे है वो इश्क मेरा ‘ताज’ क भाव,
क्या मोह्हबत मेरी उनके लिए इतनी सस्ती है..”

४१-“एक अरसा बीत गया मोह्हबत को देखे,
सिनी में उसने पलना चोद्द दिया,
खुबसूरत क कायल न थे हम उनके,
और उसने शमा बन क ढालना चोद्द दिया,
बेवफाई की चादर ऊदे ज़ख्मो को छुपा लिया,
अब नासूर-ऐ-ज़ख्मो को मलना चोद्द दिया,
चाहत है आज भी उनकी एन नजर की,
ठोकर न लग जाए ये सोच उनकी गली में चलना चोद्द दिया..”

४२-“दुरिया ज्यादा बाद जाए तो
नजदीकियों का सबब होता है,
ये उम्र का तकाजा और,
मोह्हबत का आलम अजब होता है,
हर्फो से ज़ख्म दू ये मुमकिन नही,
चाहे मुन्तजिर नजर तो सब होता है,
तहे दिल से है हम तन्हाई क इंतज़ार में,
क अब मोह्हबत-ऐ-इकरार कब होता है...”

४३-“मई भी हु इस नश्तर-ऐ-अवाम का रिंद,
क डूबा हुआ शराब-ऐ-कमबख्त नही,
दिल पिघलता है मों की तरह,
और शमा परवाने से सख्त नही,
सूखे पत्ते झाड़ चुके है गम-ऐ-तन्हाई में,
अब मई हरा भरा दरख्त नही,
खड़े है वफ़ा को ज़ज्बातों में ढल मोह्हबत हाथ में लिए
जालिम ने कह दिया क अब वक्त नही....”

४४-“वो चाहते है किसी और को
और हमे किसी और में ख़ुद का ख़याल है,
ज़ज्बात मचल रहे है बंद कमरों में,
अब हर लम्हा जैसा बीता हुआ साल है,
मैकदे में रिंद है और साकी बाज़ार में,
शरबत-ऐ-शबाब का ये कैसा बवाल है,
हम ठहरे है बहते पानी की तरह मोह्हबत-ऐ-इज़हार में,
फ़िर आज भी हम उनके लिए एक उलझा सवाल है..”

४५-“पहला लब्ज़ करे बयान कैसे,
एहसासों को ज़ज्बातों का साथ तो हो,
मुन्तजिर चौराहे पर खड़े है,
इंतज़ार-ऐ-निगाह लिए,
जान-ऐ-अनजाने उनसे कुछ बात तो हो,
गुजरी है ज़िन्दगी उनकी उलझी लातो में,
शब्-ऐ-तन्हाई में जुल्फों से खेलु क रात तो हो,
हम कर ही देंगे इज़हार-ऐ- मोह्हबत उनसे गुफ्त-अ-गु में,
कभी मेरे हम नाशी से मेरी मुलाक़ात तो हो...”

४६-“ज़ज्बातों क टुकड़े समेत रहे है मेरे अरमान,
क दफनाने का उनसे इकरार है,
संगदिल ने टूटे जिस्म को छुआ इसकदर,
अब कज़ा को मेरी ज़िन्दगी पर इख्तियार है,
नसीब हो दो गज ज़मी मेरी कुर्बत को,
क बे-जान जिस्म को नींद का इंतज़ार है,
मेरे गम-ऐ-दर्द में रोनेवाले कुछ लोग,
मेरे अपने ही मेरे मौत क ज़मीदार है...”

४७-“वो चुप है,हम चुप है,
इस चुप्पी क टूटने का इंतज़ार है,
खयाले दिल दफना रखा है उसने धडकनों में,
और सासे क्यों बेकरार है,
कशिश है अजब सी उनके इज़हार में,
क झूट भी बोले तो लगे क इकरार है,
इल्तेजा-ये-मोह्हबत में वो बाज़ार हुए इसकदर,
कही न कही तो हम भी गुनह-ऐ-गार है...”

४८-“मिअकाशी में सोया हुआ ‘ताज’ कहू,
मेरी ज़िन्दगी का बीता कल,या रुका हुआ आज कहू,
घुलाम साहिब की ग़ज़ल,या अनिकेत का साज़ कहू,
खिलता हुआ कवल कहू,या उड़ती हुई तितली कहू
मेह्स्हीं बदल कहू,या घुस्से में बिजली कहू,
खुली आँखों से देखा ख्वाब कहू,या
कुछ सवालो का उनकः जवाब कहू,
हवाओ में बहती फिजा कहू,या ज़िन्दगी से लड़ती कज़ा कहू,
रेगिस्तान को बारिश की चाहत कहू,
याखुदा से मांगती इबादत कहू.
शर्मो हया से झुकती इज्ज़त कहू,या फ़िर फ्री फ़िर,
मुझसे दूर जाती मोहब्बत कहू”

४९-“ जुल्फों को सवार दो इस जन्नत-ऐ-रुखसार से,
क हम तेरे राज़ खोल न पाये,
सुर्ख आवाज़ जो आसमा को छु लौट आई,
क मिठास एहसासों में हम घोल न पाये,
बिक गई ज़र्रे क मोल मोहब्बत मेरी,
क तराजू में मोह्हबत अपनी तौल न पाये,
ज़िन्दगी टकरा गै़ब कज़ा से,मांगे कुछ लम्हे,
मोह्हबत है उनसे,हम कभी बोल न पाये”

५०-“तू हँसी न होती तो मेरा दिल न धड़कता,
तेरे होते सुर्ख न होते,तो मुझे प्यास न होती,
तेरे एहसास न मचलते तो मई अपने ज़ज्बात संभल लेता,
तेरी रूह न मिलती तो मई जिस्म जला देता,
तेरी जुल्फ न सुलझती तो मई ख़ुद उलहज जाता,
तू जो न सिमट टी तो मई बिखर जाता,
तू जो दूर न जाती तो मई और करीब आता,
तू जो अश्क न बहती तो मई सागर समोती चुन लेता,
तू जो रास्ता न होती तो मई इंतज़ार न करता,
तू जो शमा न होती तो मई पिघल जाता,
तू जो वफ़ा न होती तो मई बेवफा हो जाता,
ए मेरे हमराज़-ऐ-राकुइब............
तू जो नफरत न होती तो मई...मोहब्बत हो जाता”

५१-“आसमा की कब्र में दफ़न है जो खुदा,
चीन लेंगे तेरी हसरत-ऐ-हुनर रत-ऐ-हुनर ये
बुलंडे पैगाम है,
वो चाहे गुजारे हर लम्हा और क साथ,
मेरे पास तन्हाई में गुजारी एक शाम है,
परदे में छुपा रखा है हुस्न-ऐ-रुखसार,
क दिल तेरा नजर-ऐ-कत्ल का खुब्सुअरत अंजाम है,
हमने तो कुछ अश्यार पेश किए थे खिदमत में,
उसने कह दिया ये तो तोह-मेट इल्जाम है”


५२-“शुक्र है क आज भी तेरी यादो क सहारे जी रहा हु,
जम हाथ में है और अश्क तेरी निघाओ से पि रहा हु,
सितम उसने भी धाये है,हम भी धायेंगे,
बस यादो से तेरे सितम को सी रहा हु,
जिंदा हु बे-जा जिस्म लिए काफ्ही है ए बेवफा,
क तेरी मोह्हबत क सहारे मई आज भी जी रहा हु”

५३-“तेरी आगोश में मरने की तम्मना है,
क अब जीने का किसे मलाल है,
मेरा कफ़न तो था बेदाग़ ए हुस्न-ऐ-मल्लिका,
फ़िर छिड़का उसपर किसने गुलाल है,
रोना है लम्हा किस्मत मेरी ता-उम्र न बहाया लहू,
फ़िर अश्को का रंग क्यों लाल है,
हमने हर्फ़-ऐ-गम लिख दी आसुओ से और उसने कहा,
खुली किताब क पहले पन्ने का बीता हुआ साल है”

५४-“चलके अश्क मेरी फितरत से और,
वो जश्न मनाने आगये,
गुनाहों की इजाद है मेरे जानिब बेवफा क्या कहे,
क वो वाफी क किस्से सुनाने आगये,
तेरी यादो की चादर ओदे सो रहा मेरा जनाज़ा,
क तुर्बत से मेरी सुकून-ऐ-कब्र को जगाने आगये,
ताबीर-ऐ-इश्क माँगा था खुदाया मेरे,
इनकार-ऐ-मोह्हबत का जुलुस लिए वो फ़िर दिल दुखाने आगये”

५५-“ वो आवाम-ऐ-बदनामी की चादर से,
इस तरह ज़ज्बात छुपा रहे है,
जालिम बड़ा गए दूरियों में फासले,
क हम और नजदीक आ रहे है,
गुल ने महकशी से बगावत कर ली,
अब रास्ते वीरानियों में अश्क बहा रहे है,
खानाबदोश है वो क मेरी मौत की चाह रखते है,
उनकी इसी चाहत को अब हम बे-इन्तहा चाह रहे है”

५६-“चाहकर बी ठुकरा दिया सादिक ने,
और उसने ठोकर खाकर भी कयामत कर ली,
धडकनों की धड़कने रोक राखी मेरे जानिब,
और दिल में बस जाने की शिरकत कर ली,
ता-उम्र संभल कर रखेंगे उनकी यादो को,
क उसने मेरे वजूद की इबादत कर ली,
नासमझ है वो रुखसार-ऐ-यार,
जो एक मुसाफिर से मोहब्बत कर उसने,
खुदाई से बगावत कर ली...”

५७-“शाम होते ही दिल तेरी यादो से लिपटकर रोता है,
तेरी सूरत-ऐ-रुखसार बनाकर बेची है वो,
अब खुदा भी कहा चैन से सोता है,
मेरा यार है एक पेश्किमती ज़र्रा,
इस ज़र्रे में जाने तेरा तस्सौर-ऐ-दीदार क्यों खोता है,
खामोशी दबा गई अरमान सारे मेरे,
कही न कही,कभी न कभी,जान-ऐ-अनजाने,
गुमनाम मुसाफिर से भी इश्क होता है”

५८-“काफिर-ऐ-नासूर से कुछ ऐसे ज़ख्म जुदा हुए,
हम कुर्बत से लड़ कर अपनी ही कज़ा पर फ़िदा हुए,
बिखर गई टुकडो में ज़िन्दगी मेरी,
हर लम्हे में हम तेरे सदा हुए,
जनाजा बनाया दोस्तों ने शौक से,
और हम दुश्मनो क कन्द्धो पर बिदा हुए..”

५९-“फितूर में हूर-ऐ-चश्म है मेरे रकीब,
हर ज़र्रे में तेरा साया है,
जानिब-ऐ-मेह्काश को इत्तेला नही मोहब्बत-ऐ-इज़हार का,
हमने ख़ुद को तेरे इंतज़ार में पल पल जलाया है,
वो बसते है किसी और की धडकनों में,
हम खुश है अपना वजूद खोकर,
तेरे ज़ज्बातों को पाया है ,
दर्द ,तड़प,अश्क,बेकरारी,अवामे भीड़,
में ए खुदा क्यों तुने हमे ही आजमाया है”

६०-“मेह्स्हीं शोक हसी हूर,जन्नते आबिर,
कभी कुछ तो कभी कुछ बुलाते है,
वो खफा हो तो केहर होता है और हम,
केहर न चूम ले इसलिए उनको मनाते है,
काफिर मोहब्बत है ताबीर-ऐ-कुर्बत से क
ख़ुद रोये वो समझे क हम उनको रुलाते है,
बेसब्र वो भी है बेसब्र खुदाई भी,
कुछ तो अदा है उनकी जालिम जो हम ख़ुद को,
तिनका तिनका जलाते है”


६१-“मेरी लौ जल रही है तेरी यादो क सहारे,
मई बुझा रहा हु ख़ुद क ज़ज्बातों को,
अब वक्त नही रहा क तुझसे रूठ जाए,
क भूल गए तेरी उनकाही बातो को,
तन्हाई में करवट लेती है तेरी रूह और,
मई रूह में धुंध रहा हु हँसी रातो को,
वो रुख पे परदा दाल सजाये है बज्म-ऐ-नूर को,
और तरसते है फ़रिश्ते भी मेरे दिल-ऐ-नाशाद से मुलाकातों को”

६२-“टर्किश-ऐ-जुम्बिश में जो तेरे हुस्न को,
मेरे एहसासों ने छुआ होगा,
खाख उठेगी जलते हुए “ताज”से क तेरी,
खुबसुरती का उसी इल्म हुआ होगा,
गहरी नजरो में तेरी अजब सी महकशी है,
इसी डर से कभी हमने तुम्हे न छुआ होगा,
खुलूस-ऐ-इनायत दी आपने हमे हजारो की भेद में,
कही न कही तो किसी क भुझे दिल से उठा धुँआ होगा”

६३-“मेरे मौला खुदा-ऐ-नाजिर
ये कैसे लम्हे दिखा दिए,
हमने लौ जला दी मोहब्बत की और उसने
इनकार से चराग भुझा दिए,
काफिर को भूक है इंतज़ार की सर-ऐ-बज्म,
उनके इंतज़ार में हमने कई जनाजे उठा दिए,
खुलूस-ऐ-वाफी निभाकर किसी और से,
जालिम हम पर बेवफाई क सारे इल्जाम लगा दिए”


६४-“काफिर-ऐ-नासूर से कुछ ऐसे ज़ख्म जुदा हुए,
हम कुर्बत से लड़ कर अपनी ही कज़ा पर फ़िदा हुए,
बिखर गई ज़िन्दगी टुकडो में और
हर लम्हे में हम तेरे सदा हुए,
जनाज़ा बनाया दोस्तों ने शौक से और
हम दुश्मनो क कांधो पर बिदा हुए”

६५-“एक अजनबी को कुछ इसकदर
तन्हाई से मोहब्बत होगी,
तेरी खुबसुरती ने जो जादू बिखेरा
खुदा की रहमत होगी,
सदियों रुलाया हमे इंकार-ऐ-ज़ख्म देकर तुने
क इकरार जो किया तो बगावत होगी,
होतो ने जुबा से लड़कर चुप्पी धर ली,
मेरा नाम जो लिया तुने मेरे रकीब,
बस कयामत होगी”

६६-“इन हवाओ में जो खुशनसीबी है,
क तेरे बदन को छु गुजर जाती है,
किस्मत हमारी कुछ ऐसी है क उनके सहमे से
एहसासों को देख ठहर जाती है,
जब खुदा ने एहतराम किया तेरे हुस्न की पर्ची का,
ये महसूस कर रूह मेरी सिहर जाती है,
अजब सी कशिश है तेरी नशीली आँखों में
नजर उठा ले जो तू तो मेरी ज़िन्दगी तिनका तिनका
बिखर जाती है”

६७-“तेरे इनकार-ऐ-मोहब्बत से
मेरे इकरार-ऐ-इरादे फ़ना कर गए,
हर्फो ने कत्ल किया,कलम ने दफनाया क
जन्नत की हूरे मेरे अरमान जावा कर गए,
मेरे जनाजे पर चदाये फूल मुस्कुराकर,
और चेहरे पर मिटटी डालने से मन कर गए,
रोता हु उसके साए से लिपटकर आज भी जानिब,
इस बात का गुरुर है क हजारो की भीड़ में,
मेरे मेह्स्हीं हमे ही तबाह कर गए”

६८-“कुछ इस तरह मेरा महबूब
काफिर-ऐ-शरीफ लगता है
बेवफाई क घर का रास्ता धुन्दू
तो वफ़ा को अजीब लगता है,
फलक पे मेरे जानिब ने खुबसुरती बिखेर दी,
मुझसे दूर होकर,अब यही मेरा नसीब लगता है,
मोहब्बत इतनी करली है उनसे क जीने की तम्मना न रही,
अब मुझे मेरा रकीब किसी और क करीब लगता है”

६९-“बेवफा कहू तो तोहिं होगी मई आया था लौट
खामोश आवाज़ सुन बेसब्री से तुने काम तो लिया होता,
खुबसूरत हो तुम क फ़रिश्ते भी नशे में चूर है,
कज़ा का नशा आजाये नजरो में तुने जाम तो लिया होता,
रोया,गिद्गिदय,कदम चूमे,तदपा तेरे इस्क्ह में,
काश मेरा हाथ तुने थाम तो लिया होता,
रोक देते हम जन्नत की और कदम,तुर्बत से लड़ जाते,
जानिब सुर्ख लबो से तुने कभी मेरा नाम तो लिया होता”

७०-“उनकी यादो क घरोंदे अपनी
नजरो में बसा रखे है,
दर्द किसी और का था,हमने ज़ख्मो
को अपने घर दिखा रखे है,
बा-वफ़ा अब बे-वफ़ा हो चले क
अपने ज़ज्बतो क टुकड़े तेरे
इनकार-ऐ-समंदर में बहा रखे है
एक एक आंसू में अक्स है उनका ये सोच हमने
पलकों पे आज भी अश्क सज़ा रखे है”

७१-“ये रास्ते तेरे नक्श-ऐ-काफ-ऐ-प्
चूमने को तरसते है,
और इस ज़मी की धूल में,
हम तेरी मोहब्बत को तरसते है,
क्यों न करू बे-इन्तहा खुलूस-ऐ-इश्क तुझसे
मेरे जानिब क तेरी एक हा को आज भी तरसते है,
दुआ मांगते है वो मेरी मौत की,
हम उनके साथ जीने को तरसते है,
वो किसी और की मोहब्बत में खुश है
और हम उनके अश्क पिने को तरसते है,
आ मेरे हमराज़-ऐ-हूर मेरी हरे क सास में बस जा
क अब हम लम्हा लम्हा तेरी बाहों में टूटने को तरसते है”